Monday, July 29, 2013

यात्रा संस्मरण - कोलकाता - खुशिओं/हर्ष   का शहर (सिटी ऑफ जॉय )



मैं पी ई सी लिमिटिड नामन  कंपनी के   विधि कक्ष में उप विधि प्रबंधक की पद पर कार्यरत  हूँ। सन 2010 जून से इस कंपनी मे मैंने प्रबंधन प्रशिक्षु के हेतु  अपनी पहली  नौकरी की शुरुवात करी। पी ई सीलिमिटिड वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली आयात निर्यात व्यापार से सम्बंधित कम्पनियों में से एक है। इस सन्दर्भ में जनवरी 2011 में विभिन्न विभागों के प्रबंधन प्रशिक्षुओं को कांडला,कोलकाता इत्यादि शहरों में भेजने का कार्यक्रम निशचित किया गया। कोलकाता के पास हल्दिया पोर्ट होने के कारण कोलकाता शहर चुना गया जहाँ पी ई सी द्वारा आयात की गयी वस्तुएं पोर्ट गोदाम में रखी  जाती हैं। साथ ही मे कोलकाता पोर्टभिन्न गोदाम इत्यादी देखने की व्यवस्था की गयी एवं सूची में समावेशकिया गया।
यह सुनकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा क्यूंकि मैंने कोलकाता  शहर के बारे मे सुना बहुत था परन्तु  कभी देखा न था  सिन्धी होने के पश्चात भी मुझे बंगाली रीती रिवाज़मिठाइयाँयहाँ का पहनावाअंग्रेजों के ज़माने की बनी संरचनाएं एवं भवनों इत्यादी में बहुत दिलचस्पी एवं रूचि थी।  आखिर कर मुझे मौका मिला और जनवरी की कड़ाकेदार ठण्ड के बीच हम एक रविवार शाम  कोलकाता राजधानी से अपनी मंजिल की और निकल पड़े । दिल्ली से कोलकाता के सफ़र के बीच हमारी गाडी  इलाहाबादगया,बिहारतथा धनबाद जैसे शहरों से होते हुए बंगाल की ओर पहुंची।  हंसते-गातेखेलते-खाते हुए हम अगली सुबह हावड़ा जंक्शन पहुँच गए। रेलगाड़ी से उतर कर  स्टेशन से बाहर  निकलते ही मुझे "सिटी ऑफ जॉय" के नाम से मशहूर कोलकाता की पहली झलक दिखाई दी। ऐसा लगा मानो मुझे भारत के दो पहलू एकसाथ जीते हुए नज़र आए। एक तरफ थे स्टेशन से बाहर एवं अन्दर जाते हुए सुन्दर कपड़ों, गहनों में लदे हुए कोलकाता के बंगाली निवासी। साथ में बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते कोलकाता के नौजवान  और ठीक दूसरी तरफ, मेरी नज़र पड़ी हुगली नदी पर बने  प्रसिद्ध  हावड़ा ब्रिज पर जिसे देख एक अलग ही दुनिया का एहसास हुआ 

हावड़ा ब्रिज पर हर तरफ लोगों का जमावड़ा था। इतने लोग देख दिल्ली के चांदनी चौक की याद आ गयी  ऐसा लगा मानो मैं 50 साल पीछे किसी ब्‍लैक एवं वाईट दुनिया में कदम रख चुकी थी । ब्रिज के दोनो तरफ सामान बेचते हुए दुकानदार, खिलौने, मछली रखे हुए औरतें एवं छोटे छोटे बच्‍चे, मुख्‍य शहर से हावड़ा जाने वाले आम आदमी, मजदूरों की तेज़ रफ़्तार , फैरी से रस्‍ता पार करने वाले व्‍यापारी, इन सब को देख लगा कोल्कता मे मुंबई जैसी भागम भाग भी थी । पिछले कुछ वर्षों में कोलकाता  शहर ने  खूब प्रगति करी, श्री ज्योति बासु जी एवं ममता दीदी ने अपने पश्‍चिम बंगाल की बढौ़ती के लिए खूब निरंतर प्रयास किया। नतीजा मेरे समक्ष था।  जैसे जैसे मैं कोल्कता शहर के भीतर आने लगी, मुझे इस शहर के विकास की झलक दिखाई दी   एक तरफ  थी ऊंची ईमारतें, सुंदर विशाल विद्यासागर सेतु पुल, बड़े बड़े  होटल, मॉल , कलकत्ता उच्‍च न्‍यायालय, राईटर्स बिल्‍डिंग, मशहूर इडन गार्डन स्टेडियम, इत्यादी  । तो दुसरी तरफ था विक्‍टोरिया मेमोरियल, अंग्रेजो की वास्‍तुकला के अनुसार दिखती लाल ईंटो की इमारतें,विक्‍टोरियल संरचनाएं, भवन, छोटी-छोटी पटरियों पर समान बेचते नया बाज़ार (New Market)  के दुकानदार एवं विक्‍टोरिया मेमोरियल के बाहर चलते सैलानियों के लिए रथ वाले  घोड़े  । हमारा होटल जे.सी.बोस सड़क पर स्‍थित था एवं सुविधाओं से भरपूर था। परन्‍तु मैंने ये जाना कि  असली कोलकाता का मज़ा गाड़ी में नहीं अथवा रिक्‍शा, ऑटो तथा  सालों से चलती आरही सड़क पर ट्राम में था।

हर तरफ मुझे पीले रंग की टैक्‍सियां दिखाई दी। सब एक समान थी तथा मरसीडीज़ गाड़ी के बगल में चलती 1-2 रूपये में सफ़र करी जाने वाली ट्राम भी साथ दिखाई दी।  पूरी जिंदगी दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद हर नए शहर का रहन-सहन, बोल-चाल,रीति-रिवाज़ जानने की जागरूकता मुझमें हमेशा रही। पहले ही दिन से कोलकाता मुझे रास आया। जैसे कि कहते है:  कोलकाता हमार खूब भाला लागली छे । कहने का तात्पर्य ये कि मुझे कोलकाता बहुत अच्‍छा लगा। पहले दिन  कि शाम को हमने न्यू मार्किट में खरीददारी करने का मन बनाया। मैं हैरान थी कि वहॉं चीजे़ं कितनी सस्‍ती मिल रही थी। दिल्‍ली के मुताबिक एक तिहाई दाम पर चूडियॉं, गहने, बैग, जूते, कुर्ते इत्‍यादि मिले। न्यू मार्किट दिल्‍ली के लाजपत एवं सरोजिनी नगर समान है। कम दाम मे अच्छा समान मिला । कोल्कता चमड़े के लिए भी मश्होर है एवं प्रसिद्ध "श्री लेदेर्स " दूकान भी इस बाज़ार मे स्थित  है यहाँ  खरीदारी का हमने खुद लुत्फ़ उठाया  

 अगले दिन हम हलदिया पोर्ट गए एवं अनेक जहाज़ देखे। 3-4 घंटे की दूरी पर स्‍थित यह पोर्ट अनेक एकड़ों में फैला हुआ था। पहली बार इतने बड़े जहाज़ को अंदर से देख खूब आनंद आया। तीसरे दिन हम काली बाडी़ मंदिर गए। बंगाली अत्‍यंत पाठ-पूजा वाले, दुर्गा मां के सच्‍चे भक्‍त है, यह सब जानते हैं। दुर्गा पूजा इनका लोकप्रिय उत्‍सव है तथा काली मां एवं दुर्गा मॉं की सच्‍चे मन से पूजा करते है। कोलकाता के निवासी भक्‍तिपूर्ण हैं, यह सुना था, अब खुद देख भी लिया। बंगाली रस्मों के जैसे पूजा करने का ये मौका अत्यंत  आनंदमयी था  
इसके अलावा काली बाड़ी के नज़दीक ही स्‍थित है गौरिहाट बाज़ार। यहॉं की दुकानें बंगाली साडियॉं, कपडे़, सूट, कुर्ते इत्‍यादि के लिए प्रसिद्ध है। आदि धक्‍तेशवर नामक मशहूर दुकान में जाकर मेरा भी जी कर आया कि मैं भी खरीददारी करूँ। मेरे साथियों ने बहुत साडी़यॉं खरीदी एवं दाम देखकर मैं दंग रह गई। सुंदर से सुंदर साड़ी मात्र 6/700 रूपये की थी। मैनं बंगाल की मशहूर लाल एवं सफेद प्रिंट की साड़ी भी खरीदी। कोलकाता में खरीददारी का अलग की मज़ा है। उसी दिन शाम हम साल्‍ट लेक सिटी मॉल गए। वह साल्‍ट लेक स्‍टेडियम के नज़दीक है । यहाँ फिर दिखा कोलकाता का प्रगतिशील रूप। नौजवान फुटबाल की जर्सी पहले माल में घूम रहे । एक से एक मशहूर ब्रैंड वहां मौजूद थे। इसके अलावा कोल्कता के निवासी खूब मनोरंजन के शौक़ीन हैन. संगीत नाच गाना, इत्यादी में रूचि रखते हैं   कोलकाता में जगह-जगह संगीत, कला अकेडमी तथा पढ़ने (रीडिंग) क्‍लब स्‍थित हैं। अंग्रेजो के शौक तथा  रहन-सहन की झलक आज भी यहॉं दिखती है। यहॉं के नौजवान को खेल-कूद में भी खूब दिलचस्‍पी है अथवा भारत का प्रसिद्ध मोहन बगान क्‍लब फुटबाल ही भारत में फुटबॉल का स्रोत है । भारत-पाक मैच हो या  आई पी एल,  इडन गार्डन मैदान लोगों से खचा-खच भरा रहता है। अफ़सोस मैं वहां अंदर जा न सकी।

मेरे सफर के आखरी दिन में मैंने कोलकाता के लोगों में एकता के नजा़रे देखे। विभिन्नता में  भी एकता का उदाहरण देखा   चाहे कोई उत्‍सव हो या त्‍योहार या कोई राजनैतिक मुद्दा, जगह-जगह लोग एकत्र हो रैली या भाषण का हिस्‍सा बनते देखे। जिस दिन हम कोलकाता पहुँचे थे उसी दिन वहां शहर  बंद था और मैने एक जुट होकर लोगों को अपनी बात कहते हुए देखा एवं सुना। यहां के लोग अपने शहर के विकास, बहतरी के लिए जागरूक हैं। जिम्‍मेदारी लेते हैं तथा सरकार को अपनी बात भली-भांती कहते हैं। लड़कियों औरतों की इज्ज़त करते हैं एवं यहाँ कि महिलायों को मैंने निर्दलीय पाया  जहां एक ओर भारत की राजधानी होने के बावजूद दिल्‍ली वाले अपनी जिंदगी में मग्न रहते हैं, वही दूसरी और कोलकाता में अमीरी गरीबी, भिन्‍न जातियों में भी एक जुटता  है। कपड़ा एवं खाना आज भी यहां खूब सस्‍ता मिलता है परन्‍तु दूसरी तरफ सब जानते है कि बडे़-बड़े उद्योगपति, विद्वान,लेखक, खिलाड़ी, गायक, अभिनेता, निदेशक यहां से उभरे हैं। साहित्‍य हो या लेख, बालीवुड हो या क्रिकेट, बंगाल ने भारत को अनेकों नाम एवं गौरव दिए हैं। चाहे सौरव दादा हो या रविन्‍द्र नाथ टैगोर, ममता बनर्जी, रानी मुखर्जी हो या ज्‍योती बसु, भारत में इनकी भूमिका का वर्णन करने की जरूरत नहीं।

मेरे कुछ दिन के कोलकाता के सफर में मैंने इस शहर को जानने समझने का प्रयास किया, हूगली नदी के किनारे खड़े होकर समुद्र को देखा, नदियों  को निहारा, विद्यासागर सेतु  ब्रिज की सुंदरता, विशालता को संराहा। के सी दास की प्रसिद्ध मिठाई का लुत्‍फ उठाया। मैंने बहुत शहर घूमें परन्‍तु यह सफर मेरे लिए सबसे यादगार रहा। कोलकाता प्रगति के मार्ग पर निरंतर है परन्‍तु आज भी वह अपनी जड़, नैतिक मूल्‍यों को नहीं भूला है । एक आम आदमी आज भी ट्राम में या फैरी से सफर करता है, यहाँ के निवासी  दो रूपय से लेकर 500 रू० का खाना खाते है। पुराना एवं नया कोलकाता एक  साथ जीवित है। सिक्‍के के दो पहलू की तरह, कोलकाता के यह दो रूप को एक साथ रहते देख आनंद आया |