Wednesday, September 20, 2017

"सपने देखने का हक़ सबका "

मन  की  बात : चित्र  बोलते हैं :



पंजाब  राज्य  कार्यालय  में  १-१५ सितम्बर  के  दौरान  आयोजित  हिंदी  पखवाड़े  में  मन  की  बात  प्रतियोगिता  आयोजित  की  गयी  थी।  जो  कविता  मैंने  वहाँ लिखी  उसी  को  यहाँ  प्रस्तुत  किया  है।

"सपने देखने  का  हक़  सबका "

पहला  पहलू : गरीब  लड़की का:
इस  चित्र  में    सबसे  पहले  नज़र गयी  वह थी  एक  मासूम सी लड़की  नाम रखना चाहूंगी ज्योति ,
  पीले वस्त्र  पहने  उम्र लगभग ४-५  वर्ष , साधारण से भी  कम  जीवन  व्यतीत  करती  लगती   ज्योति |
यूँ तो आँगन  में ख़ुशी ख़ुशी पिता  की  गोद  में  है  लगती  बैठी  हुई ,
परन्तु   उसके चेहरे  और  आँखों  से  उसके  मन  की  उदासी  की  झलक  प्राप्त हुई |

अपने समक्ष  सुन्दर  सी  फ्रॉक  पहने  लड़की  को जब  चिड़िया  को  दाना  खिलाते  हुए  देखा  ज्योति  ने ,
मन ही मन  खुद  को   उस  लड़की  से  विभिन्न  पाया , शायद  ईर्ष्या  के  भाव  को  महसूस  किआ  ज्योति  ने |
उस  अमीर  लड़की के पहनावे , जूते , हाव भाव को गौर  से  देखते  हुए  आखिर  ज्योति  क्या सोच  रही  है ?
इस छोटी सी उम्र में, खेलने कूदने के बचपन में जीवन के मूल  भावों का अनुभव तो नहीं  कर रही है ??

वह सोच रही  होगी।  इस लड़की का -परिवार  कैसा  कहाँ  होगा,  दोस्त कौन होंगे  ,खिलौने   कितने  सारे  होंगे ,
क्या वह स्कूल  जाती  होगी , नयी  किताबें  पढ़ती  होगी , कितनी खुश होगी,,,  क्या मेरे भी दिन  बदलेंगे ??
एक तरफ  ज्योति की   इच्छा  थी , इस  लड़की  के  पास जाये , दोस्ती  का  हाथ  बढ़ाये ,चिड़िया  को  अपने  नए  दोस्त  के  साथ  दाना  खिलाये। ...
पर फिर  ज्योति  को  याद  आया  वह  सड़क  का  नज़ारा,  जब बड़ी  गाड़ियों  में  बैठे  ऐसे  ही  बच्चे  उसे  और  उसके  पिता  को  रेड  लाइट के  पास  केवल   १-२ रूपये  देकर  दूर  भगाये  | | |

और  मासूम सी  ज्योति  अपने  पिता  की  गोदी  में  स्थिर  बैठी है। ... 

दूसरा  पहलू : पिता :
मैं,  ज्योति  का  पिता , उम्र  ३३  वर्ष , पिछले  १० सालों  से  सडकों  पर   किताबें  बेचता  हूँ ,
रोज़  तकरीबन  १० -१५  मील चलकर  चंद  रूपये  कमाकर  अपने  परिवार  का  पेट  भरने  की  कोशिश  करता  हूँ | 
मेरी  गोद  में  बैठी,  मेरी  नन्ही  सी  जान  है,  मेरी  प्यारी  बेटी  ज्योति ,
मेरे  जीने  की  आस , मेरी  कड़ी मेहनत का  कारण  है  मेरी  प्यारी  ज्योति | 

तो  क्या  हुआ  अगर  आज  हम  गरीब  हैं , रहने  को  घर  नहीं, खाने  के  लिए  पैसों  की  कमी  है ,
परन्तु  सपने  देखने  का  हक़  तो सबको  है, एक  बेहतर  जीवन  की  अपेक्षा  करने  में  कोई   हानि नहीं   है | 
एक  दिन मैं  भी  अपनी ज्योति  को  इस  लड़की  की  तरह  पढ़ाऊंगा  और  अच्छे  स्कूल  भेजूंगा ,
नीली  फ्रॉक  पहने  चिड़िया  को  दाने  खिलाते  इस  लड़की  के  सामान  और  इससे  भी  बेहतर  अपनी  बेटी  को  भी  बनाऊंगा | 

ये  वादा  है  मेरा  अपनी  बेटी  से , मेरी  प्यारी  ज्योति  से 
परन्तु  ये  वादा  है  मेरा  खुद   से, 
ये  वादा  है  मेरा  खुद   से...... 


और  यही  सोचते  हुए  ज्योति  के  पिता  के  चेहरे  पर  एक  हलकी सी  मुस्कान  है। 

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Tuesday, February 21, 2017

मेरा इंडियन ऑइल का छोटा सा सफर: अनेकता में एकता की मिसाल

मेरा इंडियन ऑइल का छोटा सा सफर: अनेकता में एकता की मिसाल

3 दिसम्बर 2014 को मुझे  इंडियन ऑइल के विशाल परिवार का हिस्सा बनने का सुनहरा अवसर मिला
28 साल दिल्ली में गुजारने के बाद पहली दफा किसी और शहर में रहने का मौका मिला
एक और अपनी पुरानी नौकरी, अपने माता पिता एवं दोस्तों से दूर होने का दुख था
पर दूसरी ही और अपने जीवन साथी के संग एक नयी ज़िंदगी शुरू करने का जोश एवं उत्साह था
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चंडीगढ़ शहर का नाम बहुत सुना था, भारत के सबसे सुंदर शहर में से एक है, इस बात का अनुमान था
पर हूँ तोह आखिर दिल्लीवाली, जिस शहर में पली बड़ी, पढ़ाई की, उसे छोडने से मन थोड़ा थोड़ा बेचैन था.
17 दिसम्बर, अपने जनम दिन से एक दिन पहले मैंने पंजाब राज्य कार्यालय में कार्यभार संभाला
पहले ही दिन लोगों के मित्रतापूर्ण स्वभाव, उनके प्रेम एवं स्नेह में एक अपनापन सा महसूस हुआ, मेरी आशंकाओं को दूर कर डाला.
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धीरे धीरे जहाँ एक और में इंडियन ऑइल के रंग में ढलने लगी,
वही दूसरी और इस शहर की खूबसूरती एवं रहन-सहन की तरफ आकर्षित होने लगी
इंडियन ऑइल में भारत के विभिन्न राज्यों से आए अफसरों का अदभुत मिश्रण था
और हमारे कार्यालय में ही अनेकता में एकता का गजब उदाहरण मेरे समक्ष था

लगभग दो वर्ष के यहाँ अनुभव में मुझे किस्मत से चंद मित्रों का अनंदमयी साथ मिला
जिसने मेरे इन दो वर्षों के लम्हों को और भी यादगार एवं अनमोल बना डाला
जहाँ एक और दक्षिण भारत से आए एक लड़के ने पहली बार एक हिन्दी भाषी राज्य में कार्यभार संभाला, और हिन्दी सीखने का कठिन प्रयास किआ,
वहीं दूसरी ओर लेह लदाख की कठोर लोकेशन से आए दो मित्रों के अनुभवों एवं साहस ने मुझे आशावादी होना सिखाया
जहाँ एक और बिहार से आए और पोलैंड में Japanese पढ़ाये एक लड़के ने चंडीगढ़ में हिन्दी विभाग का पद संभाला,
वहीं दूसरी और नाम एवं स्वभाव से शांत पर हरयाणा के गबरू जवान ने हमारे समूह में एक नया रंग डाला
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अलग अलग धर्मों, समुदाय,परिस्थितियों से होने से बावजूद, इस सब के परे, हम सब साथ खाते, वक्त बिताते, एक दूसरे के सुख दुख में साथ देते हैं
पंजाब राज्य कार्यालय में अनेकता में एकता का प्रतिरूप होने का शायद हम छोटा सा उदाहरण कह सकते हैं.

हम सब की मात्र भाषा भले ही अलग हो पर हम सब को जोड़ती, एक सूत्र में बाँधती है भाषा हिन्दी,
सरल, सुलभ जिस भाषा के माध्यम से  हम सब अपने अपने विचार अपने भाव खुले मन se  व्यक्त करते हैं, ऐसी है ये भाषा हिन्दी
अंग्रेज़ी चाहे दुनिया में प्रचलित हो, नौकरी एवं प्रगति के लिए अनिवार्य ज़रूर समझी जाती हो,
परंतु जो हमारे, दिल की, हमारे मन की भाषा थी , है और रहेगी वह है हमारी अपनी हिन्दी. 
हमारी अपनी हिन्दी.
हमारी अपनी हिन्दी.*************************************************************************